मैं D K P स्कूल की अंतरात्मा , करुण कंदन से गुहार लगाने पर विवश ।

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डॉ निकेत शुक्ला की कलम से

 

 

मैं “डी.के.पी. शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ” बोल रहा हूँ।

कोटा की धरती पर आज भी अपना सीना ताने खड़ा हूँ। वैसे तो मेरा नाम मेरे दानदाताओं ” श्री दया भाई-खुशाल भाई पटेल” के नाम पर रखा गया है।पर मैं कोटा और आसपास के अंचलों में “D.K.P.” के नाम से ही प्रसिद्ध हूँ।


मैंने पीढ़ी दर पीढ़ी कोटा के निवासियों को शिक्षा की ज्योति से प्रकाशित किया है। मैंने अपने प्राँगण में अंग्रेजों द्वारा निर्मित द्वार को भी देखा है और अपने आँगन में किलकारी भरते नवपुष्पों को पल्लवित होते भी देखा है। मैंने देखा है कोटा के इतिहास को बदलते हुए।
पर आज , आज मैं अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहा हूँ। मेरा आँगन,जिसकी माटी में खेलकर कई प्रतिभाओं ने मुझे अनेक गौरव के क्षण दिए। आज वह आँगन “नशाखोरी का गढ़” बन चुका है। जो मुझे निरंतर रौंद रहा है और अकल्पनीय पीड़ा दे रहा है। कोटा के निवासी,नेता व प्रशानिक अधिकारी, जिनके भविष्य को मैंने अपने स्नेह से सिंचित किया ,वे लोग केवल मूकदर्शक बने हुए इस कुकृत्य के साक्षी बने हुए हैं।


कुछ लोग हैं जिन्हें मेरे इस आँगन की चिंता है। वे लोग निरन्तर मेरी सेवा करते रहते हैं।कभी शराबियों द्वारा फैलाई गई गंदगी से मुझे निजात दिलाते हैं, तो कभी वृक्षों से मेरे हृदय को हरा-भरा करते हैं।पर मैं ये सोचकर अत्यंत दुखी हो जाता हूँ कि मेरे ही आँगन में खेलकर बड़े हुए मेरे बच्चे ,मेरा ही आँगन दूषित-कलुषित कर रहे हैं।
कौन रोकेगा उन्हें, कौन समझायेगा उन्हें। शायद कोई नही !
क्योंकि आतताईयों के कदमों तले रौंदे जाना शायद मेरी नियति है।

मैं अपने व्यथित मन के उलझे धागे खोल रहा हूँ।
मैं “डी.के.पी. उच्चतर माध्यमिक विद्यालय” बोल रहा हूँ।।

मैं “डी.के.पी. उच्चतर माध्यमिक विद्यालय” बोल रहा हूँ।।😔😔😔